सोनी सोरी को मिला अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार सम्मान
कौन है सोनी सोरी?
सोनी सोरी एक आदिवासी कार्यकर्ता हैं। साथ ही वह नारी अधिकारों की रक्षक हैं, जो छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाके में काम करती हैं। वह और उनके सहकर्मी, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ वकालत करते हैं। उन्होंने भारत के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रो में राज्य-प्रायोजित दुर्व्यवहार जैसे- घर जलाना, बलात्कार और बिना वजह आदिवासियों को यातनाएं देना व उनका यौन-शोषण करना आदि के विरोध में संलेख पत्र तैयार किये और इन गतिविधियों के खिलाफ संघर्ष किया है। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थाओं को माओवादी संगठनों से होने वाली हानि से भी बचाया है। सुरक्षा बलों ने उनके इन कार्यों के प्रतिशोध में, उन्हें हिरासत में बंद कर कई तरह की अमानवीय यातनायें दी और उनके शरीर में पत्थर डाल कर घंटों यातनाएं दी। सोनी सोरी ने दो वर्षों से अधिक कारावास सहा है। कुछ वर्षों बाद कुछ लोगो ने उनके चेहरे पर रसायन डाला जिससे उनके चेहरे की चमड़ी जल गई। इतना ही नहीं, उन्हें धमकी दी गई कि अगर उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा किये गए बलात्कारों के खिलाफ वकालत करनी नहीं छोडी, तो उनकी बेटियों का भी ऐसा ही हश्र होगा। किन्तु बिना डरे उन्होंने अपने कार्य के प्रति अडिगता दिखाते हुए काम बंद करने से इंकार किया और आज भी वह धमकी, अभित्रास और बदनामी के बावजूद उन खतरनाक संघर्ष क्षेत्र में सक्रिय हैं।
सोनी सोरी सहित विश्व के पांच मानवाधिकार रक्षकों को ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार सोनी सोरी के संघर्षों का सम्मान तो है ही, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उनके उपर किये गये जुल्म के खिलाफ विश्व समुदाय का विरोध भी है।
सोनी सोरी ने फॉरवर्ड प्रेस से बातचीत में स्वयं को मिले इस विश्व स्तरीय पुरस्कार को बस्तर के आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे तमाम जमीनी सामाजिक कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने बताया कि इस सम्मान से उनके साथ काम कर रहे साथियों का मनोबल बढ़ेगा। सोनी ने बताया कि मेरे साथ जो भी हुआ, वह बस्तर में रोज घटने वाली घटनाओं में से एक है। वह बस्तर के उन सभी गाँवो में नही पहुँच सकती हैं जहां रोज किसी न किसी आदिवासी की हत्या या बलात्कार हो रही है। सैकड़ों गाँव अपनी ही जनता से युद्ध के नाम जला दिए गए हैं। हजारों आदिवासी मुठभेड़ के नाम पर मार डाले गए। हजारों निर्दोषों को जेल में ठूंसा गया है। सोनी ने बताया कि उसने माओवादियों का भी कहर झेला है, जिन्होंने उनके पिता को मारा। मगर अब अपने जीते जी वह यह लड़ाई बन्द नहीं करेंगी।
सन 2005 से ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार हर साल उन मानवाधिकार रक्षकों को दिया जाता रहा है, जिन्होंने खुद को जोखिम में डाल कर भी अपने समुदाय के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और बढ़ावा देने में अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए योगदान दिया है। पहले यह सिर्फ एक रक्षक या किसी एक आन्दोलन को दिया जाता था। लेकिन इस वर्ष यह पहली बार पांच अलग-अलग देशो के पांच मानवाधिकार रक्षकों को दिया जा रहा है। 2018 के इन पांच पुरस्कार विजेताओं व उनके परिवारों को विभिन्न तरीके के हमलों का, मानहानि, कानूनन उत्पीड़न, मृत्यु की धमकी, कारावास और अभित्रास आदि का सामना करना पड़ा है।
हालांकि सोनी, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बदनाम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार व पुलिस द्वारा बनाये गए ‘अग्नि’ व ‘सामाजिक एकता मंच’ आदि संगठनों के माध्यम से सोनी सोरी को राष्ट्रद्रोही और माओवादी होने का तक आरोप लगा दिया गया।
फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन कहते हैं, “विभिन्न देशों की सरकारें और शोषकवर्ग मानवाधिकार रक्षकों को बदनाम कर उनके हौसले को कुंद करने का प्रयास करते हैं और उनके मानव कल्याण की दिशा में किये गये कार्यों को गैरकानूनी घोषित करते हैं। इसके खिलाफ विश्व भर से सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एकमत से स्वीकार किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान और सम्मान मानवाधिकारों को लेकर सर्वस्व दांव पर लगा देने वाले बहादुरों के साथ खड़ा होना जरूरी है। यह पुरस्कार इसी भावना पर आधारित है।” वे आगे कहते हैं, “यह पुरस्कार इस बात का साक्षी है कि इन रक्षकों को अन्तराष्ट्रीय समुदायों का पूर्ण समर्थन है और उनका बलिदान नज़रंदाज़ नहीं हुआ है। हम उनके अदम्य साहस की सराहना करते हुए उनके साथ अटल विश्वास के साथ खड़े है।”
मेरी प्रेरणस्रोत
✍️कोयतुर देवरावेन भलावी
सोनी सोरी (जन्म : १९७५ ई॰) छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित जबेली गाँव की एक आदिवासी विद्यालय शिक्षिका हैं।सन् 2011 में पुलिस द्वारा यह इल्जाम लगाया गया कि वे नक्सलियों को सूचनाएं उपलब्ध करवाती हैं। सोनी सोरी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया और छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया गया। कोर्ट में पेशी से पहले इन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में रखा गया, जहां छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उन्हें नंगा किया गया और बिजली के झटके लगाए गए। थर्ड डिग्री टार्चर की वजह से कोर्ट में पहले दिन पेशी के दौरान वे चल भी नहीं पा रहीं थीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतंत्र जाँच करवाए जाने पर उनके यौनांग में तीन पत्थर पाए गए। सोनी सोरी को कोर्ट में पेशी के बाद जेल भेज दिया गया। ढाई साल की यातनापूर्ण कैद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्थाई जमानत प्रदान कर दी। छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा लगाए गए आठ आरोपों में सात झूठे निकले जबकि एक में उन्हें जमानत मिल गई।
वर्तमान में सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर हो रहे क्रूर हमलों का विरोध कर आदिवासियों को न्याय दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं। बस्तर में फर्जी मुठभेड़ों, आदिवासियों महिलाओं के साथ सुरक्षाकर्मियों द्वारा बलात्कार समेत तमाम आदिवासी उत्पीडऩ के मुद्दों को सोनी सोरी ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, जिससे वह छत्तीसगढ़ पुलिस और प्रशासन के निशाने पर हैं।
पिछले दो दशकों से बस्तर के आदिवासी, पुलिस और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं। कभी पुलिस द्वारा तो कभी नक्सलियों द्वारा आदिवासियों को मारने की खबरें अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। भय के कारण हजारो आदिवासी बस्तर छोडऩे पर मजबूर हो गए हैं। बस्तर एक युद्धक्षेत्र बन गया है, जहां पुलिस और नक्सलियों की गोलियां चलती हैं और मरता है सिर्फ आदिवासी।
बस्तर में आदिवासियों के लिए जो भी कुछ करता है, वह पुलिस और प्रशासन के निशाने पर आ जाता है। शायद यहीं कारण है कि सोनी सोरी भी निशाने पर हैं।
✍️koytur devraven bhalavi
सोनी सोरी एक आदिवासी कार्यकर्ता हैं। साथ ही वह नारी अधिकारों की रक्षक हैं, जो छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाके में काम करती हैं। वह और उनके सहकर्मी, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ वकालत करते हैं। उन्होंने भारत के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रो में राज्य-प्रायोजित दुर्व्यवहार जैसे- घर जलाना, बलात्कार और बिना वजह आदिवासियों को यातनाएं देना व उनका यौन-शोषण करना आदि के विरोध में संलेख पत्र तैयार किये और इन गतिविधियों के खिलाफ संघर्ष किया है। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थाओं को माओवादी संगठनों से होने वाली हानि से भी बचाया है। सुरक्षा बलों ने उनके इन कार्यों के प्रतिशोध में, उन्हें हिरासत में बंद कर कई तरह की अमानवीय यातनायें दी और उनके शरीर में पत्थर डाल कर घंटों यातनाएं दी। सोनी सोरी ने दो वर्षों से अधिक कारावास सहा है। कुछ वर्षों बाद कुछ लोगो ने उनके चेहरे पर रसायन डाला जिससे उनके चेहरे की चमड़ी जल गई। इतना ही नहीं, उन्हें धमकी दी गई कि अगर उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा किये गए बलात्कारों के खिलाफ वकालत करनी नहीं छोडी, तो उनकी बेटियों का भी ऐसा ही हश्र होगा। किन्तु बिना डरे उन्होंने अपने कार्य के प्रति अडिगता दिखाते हुए काम बंद करने से इंकार किया और आज भी वह धमकी, अभित्रास और बदनामी के बावजूद उन खतरनाक संघर्ष क्षेत्र में सक्रिय हैं।
सोनी सोरी सहित विश्व के पांच मानवाधिकार रक्षकों को ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार सोनी सोरी के संघर्षों का सम्मान तो है ही, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उनके उपर किये गये जुल्म के खिलाफ विश्व समुदाय का विरोध भी है।
सोनी सोरी ने फॉरवर्ड प्रेस से बातचीत में स्वयं को मिले इस विश्व स्तरीय पुरस्कार को बस्तर के आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे तमाम जमीनी सामाजिक कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने बताया कि इस सम्मान से उनके साथ काम कर रहे साथियों का मनोबल बढ़ेगा। सोनी ने बताया कि मेरे साथ जो भी हुआ, वह बस्तर में रोज घटने वाली घटनाओं में से एक है। वह बस्तर के उन सभी गाँवो में नही पहुँच सकती हैं जहां रोज किसी न किसी आदिवासी की हत्या या बलात्कार हो रही है। सैकड़ों गाँव अपनी ही जनता से युद्ध के नाम जला दिए गए हैं। हजारों आदिवासी मुठभेड़ के नाम पर मार डाले गए। हजारों निर्दोषों को जेल में ठूंसा गया है। सोनी ने बताया कि उसने माओवादियों का भी कहर झेला है, जिन्होंने उनके पिता को मारा। मगर अब अपने जीते जी वह यह लड़ाई बन्द नहीं करेंगी।
सन 2005 से ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार हर साल उन मानवाधिकार रक्षकों को दिया जाता रहा है, जिन्होंने खुद को जोखिम में डाल कर भी अपने समुदाय के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और बढ़ावा देने में अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए योगदान दिया है। पहले यह सिर्फ एक रक्षक या किसी एक आन्दोलन को दिया जाता था। लेकिन इस वर्ष यह पहली बार पांच अलग-अलग देशो के पांच मानवाधिकार रक्षकों को दिया जा रहा है। 2018 के इन पांच पुरस्कार विजेताओं व उनके परिवारों को विभिन्न तरीके के हमलों का, मानहानि, कानूनन उत्पीड़न, मृत्यु की धमकी, कारावास और अभित्रास आदि का सामना करना पड़ा है।
हालांकि सोनी, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बदनाम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार व पुलिस द्वारा बनाये गए ‘अग्नि’ व ‘सामाजिक एकता मंच’ आदि संगठनों के माध्यम से सोनी सोरी को राष्ट्रद्रोही और माओवादी होने का तक आरोप लगा दिया गया।
फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन कहते हैं, “विभिन्न देशों की सरकारें और शोषकवर्ग मानवाधिकार रक्षकों को बदनाम कर उनके हौसले को कुंद करने का प्रयास करते हैं और उनके मानव कल्याण की दिशा में किये गये कार्यों को गैरकानूनी घोषित करते हैं। इसके खिलाफ विश्व भर से सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एकमत से स्वीकार किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान और सम्मान मानवाधिकारों को लेकर सर्वस्व दांव पर लगा देने वाले बहादुरों के साथ खड़ा होना जरूरी है। यह पुरस्कार इसी भावना पर आधारित है।” वे आगे कहते हैं, “यह पुरस्कार इस बात का साक्षी है कि इन रक्षकों को अन्तराष्ट्रीय समुदायों का पूर्ण समर्थन है और उनका बलिदान नज़रंदाज़ नहीं हुआ है। हम उनके अदम्य साहस की सराहना करते हुए उनके साथ अटल विश्वास के साथ खड़े है।”
मेरी प्रेरणस्रोत
✍️कोयतुर देवरावेन भलावी
सोनी सोरी (जन्म : १९७५ ई॰) छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित जबेली गाँव की एक आदिवासी विद्यालय शिक्षिका हैं।सन् 2011 में पुलिस द्वारा यह इल्जाम लगाया गया कि वे नक्सलियों को सूचनाएं उपलब्ध करवाती हैं। सोनी सोरी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया और छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया गया। कोर्ट में पेशी से पहले इन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में रखा गया, जहां छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उन्हें नंगा किया गया और बिजली के झटके लगाए गए। थर्ड डिग्री टार्चर की वजह से कोर्ट में पहले दिन पेशी के दौरान वे चल भी नहीं पा रहीं थीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतंत्र जाँच करवाए जाने पर उनके यौनांग में तीन पत्थर पाए गए। सोनी सोरी को कोर्ट में पेशी के बाद जेल भेज दिया गया। ढाई साल की यातनापूर्ण कैद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्थाई जमानत प्रदान कर दी। छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा लगाए गए आठ आरोपों में सात झूठे निकले जबकि एक में उन्हें जमानत मिल गई।
वर्तमान में सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर हो रहे क्रूर हमलों का विरोध कर आदिवासियों को न्याय दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं। बस्तर में फर्जी मुठभेड़ों, आदिवासियों महिलाओं के साथ सुरक्षाकर्मियों द्वारा बलात्कार समेत तमाम आदिवासी उत्पीडऩ के मुद्दों को सोनी सोरी ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, जिससे वह छत्तीसगढ़ पुलिस और प्रशासन के निशाने पर हैं।
पिछले दो दशकों से बस्तर के आदिवासी, पुलिस और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं। कभी पुलिस द्वारा तो कभी नक्सलियों द्वारा आदिवासियों को मारने की खबरें अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। भय के कारण हजारो आदिवासी बस्तर छोडऩे पर मजबूर हो गए हैं। बस्तर एक युद्धक्षेत्र बन गया है, जहां पुलिस और नक्सलियों की गोलियां चलती हैं और मरता है सिर्फ आदिवासी।
बस्तर में आदिवासियों के लिए जो भी कुछ करता है, वह पुलिस और प्रशासन के निशाने पर आ जाता है। शायद यहीं कारण है कि सोनी सोरी भी निशाने पर हैं।
✍️koytur devraven bhalavi








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