"All India Judicial Service (AIJS)" की स्थापना की जाए
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान दिवस (26 नवंबर 2023) के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्ताव रखा कि IAS और IPS की तरह ही "All India Judicial Service (AIJS)" की स्थापना की जाए, जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर उन्हें निचले स्तर से उच्च स्तर तक पोषित करे।
उन्होंने कहा, "मैं ऐसे बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हूं ताकि वे यहां आ सकें। वे युवा, प्रतिभाशाली, ऊर्जावान और देश के प्रति वफादार हैं। IAS, IPS के लिए अखिल भारतीय परीक्षा होती है। एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवा सितारों का चयन कर सके और वकील स्तर से उच्च स्तर तक उनकी प्रतिभा का पोषण और संवर्धन कर सके"
(लेकिन आदिवासी वर्ग से आने वाले महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी के सुझावों को नकारा गया है, इसका मतलब साफ है कि आदिवासियों को मोहरा बनाकर सरकार आदिवासियों के ही हक अधिकार को खत्म कर रही है, प्रतिनिधित्व के अधिकार को रोक रही है।)
1. वर्तमान न्यायिक नियुक्ति प्रणाली: संरचनात्मक असमानता का संकट
A) कॉलेजियम सिस्टम की विफलता—
वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों का चयन 1993 में बनाई गई कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होता है और सरकार की भूमिका केवल न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए अनुशंसित लोगों की पृष्ठभूमि की जांच तक सीमित है।
B) जाति-आधारित वर्चस्व: आंकड़ों की चौंकाने वाली सच्चाई —
"सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व"
• 2018 से 2023 के बीच हाई कोर्ट नियुक्तियों में केवल 17% SC, ST या OBC समुदायों से थे ।
• 2023 में 33 बैठे न्यायाधीशों में से कम से कम 12 (36.4%) ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार ब्राह्मण भारत की आबादी का लगभग 5% हैं।
वर्तमान में SC और OBC समुदायों से केवल चार न्यायाधीश हैं, जो कोर्ट की ताकत का केवल 12.1% है, जबकि 2007 के NSSO सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत की 60.53% आबादी SC और OBC आबादी से बनी है ।
1950 से अब तक सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति के केवल पांच न्यायाधीश रहे हैं - जस्टिस ए. वरदराजन, बी. सी. रे, के. जी. बालाकृष्णन, और वर्तमान में सेवारत जस्टिस बी. आर. गवई और सी. टी. शिवकुमार ।
अमेरिकी राजनीति वैज्ञानिक जी.एच. गैडबोइस ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया कि किसी भी समय सुप्रीम कोर्ट के 40% से अधिक न्यायाधीश ब्राह्मण थे, जबकि लगभग 50% अन्य अग्रणी जातियों से थे। 1950 से 1989 तक SC, ST और OBC न्यायाधीशों की कुल संख्या कभी 10% से अधिक नहीं हुई ।
हाई कोर्ट में प्रतिनिधित्व :—
2018 से अब तक नियुक्त 715 हाई कोर्ट न्यायाधीशों में से केवल 22 SC (3.1%), 16 ST (2.2%), 89 OBC (12.4%) और 37 अल्पसंख्यक (5.2%) थे - यानी **77% न्यायाधीश सवर्ण जाति से हैं।
नवंबर 2022 से मई 2025 तक सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा स्वीकृत 221 हाई कोर्ट न्यायाधीशों में से केवल 8 SC (3.6%), 7 ST (3.2%), और 32 OBC (14.5%) थे ।
अधीनस्थ न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व :—
2018 के आंकड़ों के अनुसार, 11 राज्यों की अधीनस्थ न्यायपालिका में OBC का प्रतिनिधित्व केवल 12%, SC का 14% से कम, और ST का लगभग 12% था - यह तब भी जब सभी राज्यों में SC, ST और OBC समुदायों के लिए आरक्षण का प्रावधान है।
C) संरचनात्मक भेदभाव की पहचान—
2013 में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने पाया कि उच्च न्यायपालिका समाज के उन वर्गों से ली गई है जो सबसे अधिक "पुरानी सामाजिक पूर्वाग्रहों से संक्रमित" हैं। रिपोर्ट ने बताया कि न्यायाधीशों का अंतर्निहित जाति पूर्वाग्रह उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
1980 में जस्टिस कृष्णा अय्यर ने इतिहासकार जॉर्ज गैडबोइस से कहा था: "सुप्रीम कोर्ट मुख्य रूप से ब्राह्मण और उच्च वर्ग का था" ।
2) AIJS प्रस्ताव के समर्थन में तर्क: सामाजिक न्याय का संवैधानिक आदेश
A) विविधता और सामाजिक प्रतिनिधित्व:—
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि न्यायपालिका में भारत की अनूठी विविधता का अधिक विविध प्रतिनिधित्व निश्चित रूप से न्याय के उद्देश्य को बेहतर ढंग से पूरा करने में मदद करेगा। इस विविधीकरण प्रक्रिया को तेज करने का एक तरीका एक ऐसी प्रणाली का निर्माण हो सकता है जिसमें न्यायाधीशों को विभिन्न पृष्ठभूमियों से **योग्यता-आधारित, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया** के माध्यम से भर्ती किया जा सके।
तर्क :-
1. SC-ST-OBC और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा:-वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में यह गंभीर रूप से कम है।
2.बहुजन समुदायों को अवसर मिलेगा : - जिन्हें वर्तमान में व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जाता है।
3. न्याय में जनता का विश्वास बढ़ेगा : - जब लोग न्याय देने वाले लोगों में खुद का प्रतिबिंब देखेंगे।
B) पारदर्शिता और जवाबदेही :—
AIJS पूरे राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिए समान मानक स्थापित करेगा, जो एक सुसंगत और योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करेगा और न्यायपालिका की समग्र गुणवत्ता को बढ़ाएगा।
खुली प्रतियोगी परीक्षा भर्ती प्रक्रिया में चयन पैनल के विवेक को कम करेगी और चयन प्रक्रिया में जवाबदेही, पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता सुनिश्चित करेगी ।
वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली की समस्याएं :—
1.अपारदर्शिता : - कोई सार्वजनिक सुनवाई या स्पष्ट मानदंड नहीं
2.नेपोटिज्म : - 221 स्वीकृत न्यायाधीशों में से 14 बैठे या सेवानिवृत्त हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से संबंधित थे ।
3.राजनीतिक हस्तक्षेप :- राज्य-स्तरीय नियंत्रण के तहत नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप होता है
C) भ्रष्टाचार और पक्षपात से मुक्ति :—
भर्ती में बॉटम-अप दृष्टिकोण अपनाकर, AIJS का उद्देश्य निचली न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दों से निपटना है। यह दृष्टिकोण जमीनी स्तर पर न्याय वितरण की गुणवत्ता को बढ़ाने की उम्मीद है।
D) न्यायाधीशों की कमी का समाधान :—
1987 में, भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर 10.5 न्यायाधीश थे, जो 2016 में घटकर 17.86 हो गए, जबकि अमेरिका (107) और ब्रिटेन (51) की तुलना में बहुत कम है। AIJS निचली अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरेगा, वर्तमान में लगभग 5,400 रिक्त पद हैं और निचली न्यायपालिका में 2.78 करोड़ मामले लंबित हैं, मुख्य रूप से राज्यों द्वारा नियमित परीक्षा आयोजित करने में देरी के कारण ।
राष्ट्रीय कोर्ट प्रबंधन प्रणाली ने अनुमान लगाया कि 30 वर्षों में दायर किए जाने वाले मामलों की संख्या 15 करोड़ तक पहुंच जाएगी, जिसके लिए 75,000 न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी।
E) समान प्रशिक्षण मानक :-
AIJS पूरे देश में एकसमान प्रशिक्षण सुनिश्चित करेगा । राज्य संस्थानों में चयनित उम्मीदवारों को ऐसे न्यायिक अनुभव की अनुमति देने की क्षमता नहीं है।
F) राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा :-
AIJS विभिन्न पृष्ठभूमियों और क्षेत्रों के न्यायाधीशों को एक साथ लाकर राष्ट्रीय एकता और एकीकरण की भावना को बढ़ावा दे सकता है।
3) वर्तमान प्रणाली से AIJS की तुलना: IAS-IPS मॉडल की सफलता -
A) IAS-IPS मॉडल की उपलब्धियां :–
1) सामाजिक विविधता : — IAS, IPS और IFS में SC-ST-OBC के लिए आरक्षण का कड़ाई से पालन होता है ।
2) योग्यता-आधारित चयन :- UPSC की प्रतिष्ठित और पारदर्शी प्रक्रिया
3) त्वरित भर्ती :- न्यायपालिका की रिक्ति संकट से निपटने के लिए AIJS में IAS, IPS और IFS की भर्ती मॉडल के समान शीघ्र और समयबद्ध भर्ती आवश्यक है।
B) AIJS क्यों आवश्यक है?
अनुच्छेद 312 भारतीय संविधान के तहत एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के निर्माण का अधिकार है। अनिवार्य रूप से, AIJS का उद्देश्य जिला न्यायाधीशों से शुरू करके सभी राज्यों के लिए न्यायाधीशों की भर्ती को केंद्रीकृत करना है।
1976 के 42वें संविधान संशोधन ने अनुच्छेद 312(1) में संशोधन किया, जो संसद को AIJS सहित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। यदि राज्यसभा अपने वर्तमान और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन (पूर्ण बहुमत) के साथ एक प्रस्ताव के माध्यम से घोषणा करती है, तो "राष्ट्रीय हित" में एक सेवा बनाना आवश्यक या समीचीन है।
4) AIJS का सामाजिक न्याय आयाम: SC-ST-OBC के पक्ष में
A. संरचनात्मक बहिष्कार का अंत :—
वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली एक "क्लोज्ड सर्किट" है जो सवर्ण वर्चस्व को कायम रखती है। AIJS इसे तोड़ सकता है:–
1. खुली प्रतियोगिता : - हर युवा को समान अवसर
2. आरक्षण का प्रावधान :- संवैधानिक अनिवार्यता के तहत SC-ST-OBC को प्रतिनिधित्व
3. वंचित क्षेत्रों से प्रतिभा का चयन :- वर्तमान में जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों, ओडिशा और झारखंड से प्रतिनिधित्व नगण्य है ।
B) "जाति-तटस्थ योग्यता" का मिथक :—
सवर्ण तर्क — "योग्यता पर आधारित होना चाहिए, जाति पर नहीं"
• — वास्तविकता:
- सुप्रीम कोर्ट के 36.4% न्यायाधीश ब्राह्मण हैं, जो जनसंख्या का केवल 5% हैं ।
- क्या यह "योग्यता" है या "सामाजिक पूंजी का एकाधिकार" ?
- वर्तमान प्रणाली में "योग्यता" का अर्थ है :— सही पारिवारिक पृष्ठभूमि, सही कनेक्शन, सही जाति।
- AIJS वास्तविक योग्यता सुनिश्चित करेगा - "परीक्षा-आधारित, पारदर्शी, समान अवसर"
C) "न्यायिक स्वतंत्रता" के नाम पर विरोध का खंडन—
विरोधियों का तर्क :— "AIJS न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करेगा"
तथ्यात्मक खंडन: —
1.IAS-IPS की स्वतंत्रता :- UPSC द्वारा चयन से IAS-IPS की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती।
2.वर्तमान प्रणाली में राजनीतिक हस्तक्षेप :- वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में सामाजिक विविधता और सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से न्यायपालिका पर है, लेकिन यह विफल हो रही है।
3. AIJS = अधिक जवाबदेही :- संसदीय निगरानी, सार्वजनिक छानबीन, पारदर्शी प्रक्रिया।
5) राष्ट्रपति मुर्मू का प्रतीकात्मक महत्व: आदिवासी महिला राष्ट्रपति की आवाज
A) प्रतीकात्मक राजनीति का महत्व :—
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारत की "पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति" हैं। उनका यह बयान केवल एक प्रशासनिक सुझाव नहीं, बल्कि "सदियों के बहिष्कार के खिलाफ एक संवैधानिक हस्तक्षेप" है।
उनकी पृष्ठभूमि क्यों मायने रखती है :–
1.आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व : - भारत की 8.6% आबादी ST है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम है ।
2. जीवित अनुभव : - वे बहिष्कार को समझती हैं क्योंकि उन्होंने इसे जिया है।
3. संवैधानिक पद से आवाज :– यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, "राष्ट्र की आत्मा की आवाज" है।
B) "सवर्णों के विरोध" का विश्लेषण :
सवर्ण समाज के विरोध की प्रकृति —
1.विशेषाधिकार की सुरक्षा :- वर्तमान प्रणाली उन्हें लाभान्वित करती है।
2. "योग्यता" की आड़ : - अपने एकाधिकार को छिपाने के लिए।
3. संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी :- समानता, न्याय, बंधुत्व को नजरअंदाज करना।
क्यों AIJS सवर्ण प्रभुत्व के खिलाफ है।
- यह "संरचनात्मक असमानता" को तोड़ता है
- यह "वास्तविक समानता" लाता है
- यह "बहुजन समाज को शक्ति" देता है
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6) निष्कर्ष:
AIJS - सामाजिक न्याय की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम—
A. संवैधानिक अनिवार्यता -
AIJS केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं है - यह "संवैधानिक न्याय का आदेश" है,
- अनुच्छेद 14 :- समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 15(4) :- SC-ST-OBC के लिए विशेष प्रावधान
- अनुच्छेद 46 : - राज्य SC-ST के शैक्षणिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा
B. तत्काल कार्यवाई की आवश्यकता —
कार्यान्वयन की तात्कालिकता को अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता । हर दिन की देरी का मतलब है :-
- हजारों मामले लंबित रहना
- वंचित समुदायों का बहिष्कार जारी रहना
- संवैधानिक वादे का उल्लंघन होना
C. अंतिम आह्वान
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक अवसर है :—
1. न्यायपालिका को लोकतांत्रिक बनाना
2. सामाजिक न्याय को संस्थागत रूप देना
3. बहुजन समाज को सशक्त बनाना
हमें याद रखना चाहिए
> "न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए - यह सभी के द्वारा सुलभ और सभी के लिए प्रतिनिधिक होना चाहिए।"
AIJS इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका विरोध "सवर्ण विशेषाधिकार की सुरक्षा" है, इसका समर्थन "संवैधानिक मूल्यों की रक्षा" है।
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